📚 Issue V | Year III · April 2025 · pp. 1-12

श्रीमद्भगवद्गीता में मानसिक स्वास्थ्य की संकल्पना : एक गवेषणात्मक अनुशीलन

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प्रो. (डॉ.) जितेंद्र कुमार शर्मा
प्रो. (डॉ.) जितेंद्र कुमार शर्मा आचार्य एवं अध्यक्ष
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Abstract

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प्रस्तुत आलेख में श्रीमद्भगवद्गीता में मानसिक स्वास्थ्य की संकल्पना पर गवेषणात्मक दृष्टि डाली गई है। आलेख के चरण में प्रथम चरण में भगवद्गीता के अनुसार मन के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि मन बड़ा ही चंचल है। यह शरीर को क्षुब्ध और इंद्रियों को विक्षिप्त यानी परवश कर देता है। कामातुर अशांत मन ही समस्त दुःखों का मूल कारण है। भोगवासनाओं की निरंतर बहती हुई आंधी मनुष्य के विवेक पर पर्दा डाल देती है। काम, क्रोध, लोभ -मोह के वशीभूत होकर कर्म करने से मन में दुर्बलता आती है परिणाम स्वरुप मन में चिंता और मनस्ताप पैदा होता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो शरीर नानाविध बीमारियों का घर बन जाता है। भोगेच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करना मानसिक स्वास्थ्य की प्राथमिक और महत्वपूर्ण शर्त है। सचेतनता (विवेकशीलता) और अभ्यास के कठोर अनुशासन से व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है। ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ की साधना समस्त आगत और अनागत उपद्रवों और विपत्तियों तथा कष्टों के निवारण का उत्सस्थान है। मनुष्य के सच्चे स्वरूप पर भी चिंतन आवश्यक है। भोग-वासनाओं की सिद्धि जीवन

Keywords

श्रीमद्भगवद्गीता योग अध्यात्म मानसिक स्वास्थ्य इंद्रिय निःश्रेयस आत्यंतिक दुःखनिवृत्ति प्रवृत्त मानस प्रबुद्व मानस अध्यात्म मानस भौतिक शरीर बायप्रोडक्ट प्रतिफल विषयानुराग शब्द स्पर्श रूप रस गंध युक्ताहार-विहार सात्विक एवं संतुलित भोजन सात्विक दिनचर्या बौद्ध संदेश ।

Paper Details

Issue
Issue V | Year III
Published
April 2025
Pages
pp. 1-12
Language
Hindi
ISSN
3048-6319 (Online)
Publisher
Baraudi Sanskriti Sanskrit Sanskar Shiksha Samiti

How to Cite

प्रो. (डॉ.) जितेंद्र कुमार शर्मा. "श्रीमद्भगवद्गीता में मानसिक स्वास्थ्य की संकल्पना : एक गवेषणात्मक अनुशीलन." Bundelkhand Vimarsh, Issue V | Year III (April 2025), pp. 1-12. ISSN: 3048-6319.