श्रीमद्भगवद्गीता में मानसिक स्वास्थ्य की संकल्पना : एक गवेषणात्मक अनुशीलन
Abstract
Hindiप्रस्तुत आलेख में श्रीमद्भगवद्गीता में मानसिक स्वास्थ्य की संकल्पना पर गवेषणात्मक दृष्टि डाली गई है। आलेख के चरण में प्रथम चरण में भगवद्गीता के अनुसार मन के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि मन बड़ा ही चंचल है। यह शरीर को क्षुब्ध और इंद्रियों को विक्षिप्त यानी परवश कर देता है। कामातुर अशांत मन ही समस्त दुःखों का मूल कारण है। भोगवासनाओं की निरंतर बहती हुई आंधी मनुष्य के विवेक पर पर्दा डाल देती है। काम, क्रोध, लोभ -मोह के वशीभूत होकर कर्म करने से मन में दुर्बलता आती है परिणाम स्वरुप मन में चिंता और मनस्ताप पैदा होता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो शरीर नानाविध बीमारियों का घर बन जाता है। भोगेच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करना मानसिक स्वास्थ्य की प्राथमिक और महत्वपूर्ण शर्त है। सचेतनता (विवेकशीलता) और अभ्यास के कठोर अनुशासन से व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है। ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ की साधना समस्त आगत और अनागत उपद्रवों और विपत्तियों तथा कष्टों के निवारण का उत्सस्थान है। मनुष्य के सच्चे स्वरूप पर भी चिंतन आवश्यक है। भोग-वासनाओं की सिद्धि जीवन
