भारतीय ज्ञान परम्परा में दैवी-सम्पदा का स्वरुप : एक विवेचन
Abstract
Hindiमनुष्य का जीवन एक अन्तहीन यात्रा या अन्धी दौड़ नहीं है। मनुष्य का जन्म जीवन में एक महान् लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हुआ है। यह लक्ष्य क्या है? स्वामी विवेकानन्दजी ने हमें बताया है कि मानव जीवन का लक्ष्य है अपने महान् दिव्य स्वरूप की अनुभूति और अभिव्यक्ति। श्रीमद्भागवत गीता ,विवेक -चूड़ामणि और योगदर्शन में स्थित केन्द्रीय शिक्षाओं जिसे प्रस्तुत शोधपत्र में दैवी-सम्पदा के रूप में परिभाषित कर जीवन में उनके सम्यक पालन के द्वारा परमतत्व का अनुभव किया जा सकता है पर विचार विमर्श किया गया है । संस्कृतशब्दकोशोंके अनुसार 'सम्पद्' शब्द 'सम्' उपसर्गपूर्वक 'पद्' धातुके साथ 'क्विप्' करनेपर निष्पन्न होता है, जिसके अनेक अर्थ हैं। यथा- धन, समृद्धि, ऐश्वर्य, पुष्पित-पल्लवित होना, सौभाग्य, आनन्द, सफलता, पूर्ति, पूर्णता, श्रेष्ठता, धनाढ्यता, बाहुल्य, प्राचुर्य, आधिक्य, कोश, लाभ, हित, वरदान, सद्गुणोंकी वृद्धि, सजावट एवं मोतियोंका हार इत्यादि ।
मनुष्यकी समस्त चेष्टाएँ जीवनपर्यन्त सुखोंकी प्राप्ति एवं दुःखोंसे निवृत्तिमें केन्द्रित होती हैं। मनुष्यके अतिरिक्त अन्य प्राणियोंमें भी यही प्रवृत्ति पायी जा
