📚 Issue VI | Year III · August 2025 · pp. 52–63

व्याख्याकारों की दृष्टि में योगभ्रंशिकाओं का समीक्षात्मक अध्ययन

डस
डॉ. सुधांशु कुमार षडङ्गी
Professor of Sanskrit
Hindi

Abstract

Hindi

आजकल प्रत्येक प्राणी शारीरिक तथा मानसिक रूप से निरोग रहने हेतु प्रयास करता रहता है। परन्तु सामाजिक व्यवहार तथा आधुनिकता के कारण प्रतिक्षण दुःखों से सन्तप्त रहता है। क्योंकि उसकी सन्तप्तता में कारण उसके कार्यशैली तथा जीवन जीने की विधि है। अतः योग के बहुमुखी उपयोगिता के कारण समस्त प्राणी उसके शरण में जाने लगे। परन्तु योग का आश्रय भी सुकर नहीं है। क्योंकि प्रतिक्षण शारीरिक तथा मानसिक व्याधियाँ उसे सतत कष्ट पहुँचाता रहता है। इन्हें हम योग के विघ्न कह सकते हैं। इन विघ्नों के कारण ही योगसिद्धि में प्रतिबन्धक उपस्थित होता है। महर्षि पतञ्जलि ने अपने योगसूत्र में उत्तम अधिकारी हेतु ईश्वरप्रणिधान रूप वैकल्पिक साधन का उपदेश दिया है। वस्तुतः जो साधक अभ्यास तथा वैराग्य का अनुसरण नहीं करना चाहता है अपितु योगसिद्ध स्वल्प समय में करने की इच्छा रखता है, ऐसे तीव्रतम सिद्धि के अभिलाषी साधक हेतु ईश्वर के प्रणिधान रूप साधन का निर्द्देश हुआ है। इसका साधन भी सहज नहीं है। क्योंकि महर्षि ने स्वयं ही इसके साधन में प्रतिबन्धकों की प्रतिबन्धकता स्वीकार किया है। ये प्रतिबन्धक योगभ्रंशिका के रूप से स्वीकार किये गए

Keywords

निरोग कार्यशैली जीवन योग. शारीरिक मानसिक व्याधियाँ कष्ट विघ्न योगसिद्धि प्रतिबन्धक महर्षि पतञ्जलि योगसूत्र ईश्वरप्रणिधान वैकल्पिक साधन साधक अभ्यास वैराग्य योगभ्रंशिका अन्तराय ।

Paper Details

Issue
Issue VI | Year III
Published
August 2025
Pages
pp. 52–63
Language
Hindi
ISSN
3048-6319 (Online)
Publisher
Baraudi Sanskriti Sanskrit Sanskar Shiksha Samiti

How to Cite

डॉ. सुधांशु कुमार षडङ्गी. "व्याख्याकारों की दृष्टि में योगभ्रंशिकाओं का समीक्षात्मक अध्ययन." Bundelkhand Vimarsh, Issue VI | Year III (August 2025), pp. 52–63. ISSN: 3048-6319.