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Issue II | Year I ·
April 2024 · pp. 1-6
समकालीन ग़ज़लों की भाषाई संरचना
Abstract
Hindiभारत में ग़ज़ल एक आयातित विधा के रूप में जानी जाती है, इसका सफ़र बहुत लंबा है। इस विधा का मूल अरब में मिलता है। यह विधा अरबी के क़सीदे से निकलकर जब फारसी में आई, तो इसने एक नया कलेवर ग्रहण किया और ग़ज़ल कहलाई। फारसी से यह विधा हिंदी और उर्दू में आई। वर्तमान समय में अनेक भाषाओं में इस विधा पर कलम चलाई जा रही है। वास्तव में 13वीं शताब्दी में मियाँ अमीर खुसरो ने ग़ज़ल के बीज इस धरती की मिट्टी में बो कर भारत में ग़ज़ल के जनक का सम्मान पाया। तब से लेकर आज तक इस विधा की बेल निरंतर फल-फूल रही है। इस बेल को सैकड़ों मालियों ने अपनी कलम की स्याही से सींचा और सरसब्ज़ रखा। आज के दौर में इस बेल में कई रंगों की कलियाँ चटककर अपनी महक गुलशन रूपी साहित्य में फैला रही हैं।
Keywords
ग़ज़ल
ग़ज़लकार
अभिव्यक्ति
संप्रेषण
लिपि
ग़ज़लगोई
विलोपन।
Paper Details
How to Cite
यशवंत काछी डॉ. वंदना चराटे. "समकालीन ग़ज़लों की भाषाई संरचना." Bundelkhand Vimarsh, Issue II | Year I (April 2024), pp. 1-6. ISSN: 3048-6319.
